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[(( परम परमात्मा की प्राप्ति ))] ंंंंंंंंंंंं परम प्रेम ंंंंंंंंंंंंं
2016-05-20 15:05:31
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[(( परम परमात्मा की प्राप्ति ))] ंंंंंंंंंंंं परम प्रेम ंंंंंंंंंंंंं


Received: 2016-05-20 15:05:31
  परम श्रिज्ञाशँकवी जी posted in (( परम परमात्मा की प्राप्ति )) .       परम श्रिज्ञाशँकवी जी 20 May at 20:35   ंंंंंंंंंंंं परम प्रेम ंंंंंंंंंंंंं प्रेम एक गहरे सागर की भाती है जो अथाह है और ईसमे जो जितना डूबता है वो उतने आनंद के गोते लगाते है और शूख शांति खुशी पाते हैं क्योंकि प्रेम ही एक है जो सब को भाते है और हर किसी को नोर्मल बनाते हैं और दया छमा कृपा के पात्र हो जाते हैं ईसमे कोई भेदभाव नहीं होते हैं बल्कि निस्वार्थ भाव होते हैं यह एक अमृत है जिसे पीने ने से सभी के पृय होते हैं और अपने लगने लगते हैं जैसे सभी हमारे ही है और हम सभी के है ईसमे भूल चुक व गलती के लिए क्रोध नहीं बल्कि माफी व समझ है प्रेम कई प्रकार के हैं और सभी से अलग अलग रुप रंग ऊमंग में है मम्मता सनेह प्यार दुलार लाड सभी इसी में है परम श्रिज्ञाशँकवी जी ने सबसे पहले प्रेम के ही बिधान बनाये हैं जिसमें हर छड व अहसास को दर्शाये है प्रेम के ही अधार पर तो समुचि सृष्टि संसार को बनाए बसाये है जो पवित्र है सुंदर है सही है सच्चा और अच्छा है इस लिए जहां प्रेम हो वहां परमात्मा होते हैं और जहाँ परमात्मा होते हैं वहाँ सदा खुशहाल होते हैं व कीसी चीझ की कमी नहीं होते हैं यहाँ तक कि देवता देवीयो के भी कृपा होते हैं और अनय सभी प्राणियों के भी एक प्रेम ही है जो हर किसी को जीत लेते है और सदा जिंदा रहते हैं तभी तो अमर प्रेम कहते हैं ंंंंं   Like Comment Share    
   
 
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परम श्रिज्ञाशँकवी जी posted in (( परम परमात्मा की प्राप्ति )).
 
   
परम श्रिज्ञाशँकवी जी
20 May at 20:35
 
ंंंंंंंंंंंं परम प्रेम ंंंंंंंंंंंंं
प्रेम एक गहरे सागर की भाती है जो अथाह है और ईसमे जो जितना डूबता है वो उतने आनंद के गोते लगाते है और शूख शांति खुशी पाते हैं क्योंकि प्रेम ही एक है जो सब को भाते है और हर किसी को नोर्मल बनाते हैं और दया छमा कृपा के पात्र हो जाते हैं ईसमे कोई भेदभाव नहीं होते हैं बल्कि निस्वार्थ भाव होते हैं यह एक अमृत है जिसे पीने ने से सभी के पृय होते हैं और अपने लगने लगते हैं जैसे सभी हमारे ही है और हम सभी के है ईसमे भूल चुक व गलती के लिए क्रोध नहीं बल्कि माफी व समझ है प्रेम कई प्रकार के हैं और सभी से अलग अलग रुप रंग ऊमंग में है मम्मता सनेह प्यार दुलार लाड सभी इसी में है परम श्रिज्ञाशँकवी जी ने सबसे पहले प्रेम के ही बिधान बनाये हैं जिसमें हर छड व अहसास को दर्शाये है प्रेम के ही अधार पर तो समुचि सृष्टि संसार को बनाए बसाये है जो पवित्र है सुंदर है सही है सच्चा और अच्छा है इस लिए जहां प्रेम हो वहां परमात्मा होते हैं और जहाँ परमात्मा होते हैं वहाँ सदा खुशहाल होते हैं व कीसी चीझ की कमी नहीं होते हैं यहाँ तक कि देवता देवीयो के भी कृपा होते हैं और अनय सभी प्राणियों के भी एक प्रेम ही है जो हर किसी को जीत लेते है और सदा जिंदा रहते हैं तभी तो अमर प्रेम कहते हैं ंंंंं
 
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